भारतीय संस्कृति की सबसे बड़ी पहचान है – संस्कार, सम्मान और परिवार के प्रति समर्पण। इन्हीं मूल्यों को नई पीढ़ी तक पहुंचाने के उद्देश्य से संस्कारशाला का आयोजन लखनऊ में किया गया। कार्यक्रम का मुख्य विषय था – “माता–पिता और बड़ों का सम्मान”।
यह आयोजन बच्चों और युवाओं के मन में अपने अभिभावकों, दादा–दादी, गुरुजनों तथा समाज के वरिष्ठ लोगों के प्रति आदर, कृतज्ञता और सेवा की भावना विकसित करने के लिए किया गया। आज की तेज़ रफ्तार जीवनशैली में जहां पारिवारिक मूल्य धीरे-धीरे कम होते दिखाई दे रहे हैं, ऐसे समय में इस प्रकार की पहल अत्यंत आवश्यक और प्रेरणादायक है।
🌼 कार्यक्रम की प्रमुख विशेषताएँ
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बच्चों को माता–पिता के त्याग और परिश्रम की कहानियाँ सुनाई गईं।
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बड़ों के चरण स्पर्श एवं आशीर्वाद लेने की परंपरा का महत्व बताया गया।
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“परिवार ही पहली पाठशाला है” – इस विषय पर चर्चा हुई।
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विद्यार्थियों ने सम्मान, सेवा और आज्ञाकारिता पर शपथ ली।
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सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के माध्यम से भारतीय संस्कारों को दर्शाया गया।
🎯 उद्देश्य
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बच्चों में कृतज्ञता की भावना विकसित करना।
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परिवार में सद्भाव और अनुशासन बढ़ाना।
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बुजुर्गों के अनुभवों का सम्मान करना सिखाना।
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भारतीय परंपराओं को व्यवहारिक जीवन में अपनाने के लिए प्रेरित करना।
💬 प्रेरणादायक संदेश
वक्ताओं ने कहा कि –
“जो अपने माता–पिता और बड़ों का सम्मान करता है, वही जीवन में सच्ची उन्नति और सफलता प्राप्त करता है।”
👨👩👧 बच्चों पर प्रभाव
कार्यक्रम के बाद बच्चों में काफी उत्साह देखने को मिला। कई बच्चों ने अपने माता–पिता के प्रति अधिक जिम्मेदार बनने और उनकी सेवा करने का संकल्प लिया। अभिभावकों ने भी इस पहल की सराहना की और इसे समाज के लिए अत्यंत उपयोगी बताया।
🤝 समाज के लिए एक दिशा
यह संस्कारशाला केवल एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि संस्कारों के पुनर्जागरण की ओर एक महत्वपूर्ण कदम है। यदि ऐसे आयोजन निरंतर होते रहें, तो आने वाली पीढ़ी अपने मूल्यों से जुड़ी रहेगी और एक मजबूत, सुसंस्कृत समाज का निर्माण होगा।
✨ आइए, हम सब मिलकर माता–पिता और बड़ों के सम्मान की इस परंपरा को आगे बढ़ाएं और बच्चों को संस्कारवान बनाएं।











